अध्याय 31

शायद नूह की बाँहों की गर्माहट महसूस करके लैला आखिरकार अपने जज़्बातों के आगे ढह गई। आँसू उसके गालों पर एक-एक करके लुढ़कते रहे, फिर यूँ बेधड़क बह निकले जैसे बरसों का दबाव झेलता बाँध अचानक टूट गया हो।

उसका शरीर काँप रहा था। उसने नूह की कमीज़ कसकर पकड़ रखी थी, जैसे तूफ़ान में वही उसका आख़िरी सहारा हो, ...

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